पर्यावरण की हानि
प्रदूषण की समस्या से पर्यावरण का नुकसान ... प्रदूषण की समस्या के कई प्रकार हैं। जैसे जल प्रदूषण की समस्याए वायु प्रदूषण की समस्याए मिट्टी का कटाव व उर्वरता का अभाव, वन विकासए जैव विविधता का अभाव, ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन परत का क्षरण।
अति आबादी: इंसान की आबादी तेजी से बढ़ती जा रही है. 20वीं शताब्दी के शुरू में दुनिया की आबादी 1.6 अरब थी, आज यह 7.5 अरब है और 2050 तक 10 अरब हो जाएगी. इतनी विशाल आबादी प्राकृतिक संसाधनों पर भारी बोझ डाल रही है. संसाधनों तक पहुंचने की होड़ के चलते अफ्रीका और एशियाई महाद्वीप में विवाद भी होने लगे हैं.
वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन: हमारी आबोहवा और समुद्री जल कार्बन से भर चुका है. वातावरण में घुली सीओटू पराबैंगनी विकिरण को सोखती और छोड़ती है. इससे हवा गर्म, जमीन और पानी गर्म होते हैं. इस प्रक्रिया के बिना धरती बर्फीली हो जाएगी. लेकिन हवा में कार्बन की अति से सेहत को नुकसान पहुंच रहा है और गर्म होती धरती जलवायु परिवर्तन का सामना भी कर रही है.
पूंजीवादने की पर्यावरण की अपरिमित हानि !
पूंजीवादद्वारा हुई पर्यावरण की अपरिमित हानि कभीभी भरनेवाली नहीं है । पोन यू नामक चीनी तज्ञ का कहना है कि, ‘यूरोपने पिछली शताब्दी में विकास के नामपर पर्यावरण का जितना विनाश किया, उतना विनाश हमने तीन दशकों में किया है ।’
अ. मनुष्य को ३ करोड ८० लाख वर्षों से सहेजकर रखी प्राकृतिक पूंजी प्रयोग को मिली है । यदि वर्तमान की गतिनुसार उसका प्रयोग होता रहा, तो इस शताब्दी के अंत में उसमें से बहुत थोडाही शेष रहेगा ।
आ. पिछली शताब्दी के उत्तरार्ध में संसारने अपनी जमीन का एक चतुर्थांश मिट्टी का आवरण (मृदावरण) तथा एक तृतीयांश जंगल-आवरण (फॉरेस्ट कव्हर) नष्ट किया है ।
इ. पिछली शताब्दी के अंतिम तीन दशकों में पृथ्वी कीr एक तृतीयांश प्राकृतिक साधन संपत्ति समाप्त कर दी गई है ।
ई. १ सहस्र करोड रुपए व्यय करनेपर भी आठ लोगों के लिए आवश्यक प्राणवायु मनुष्य निर्माण नहीं कर सकता तथापि वही प्राणवायु पृथ्वी अर्थात् यह पर्यावरण ६०० करोड लोगों को निःशुल्क देती है !
विज्ञानके कारण हुए प्रदूषणसे विश्व पर्यावरण धोखेमें !
‘नोबेल पारितोषिक’ विजेता ‘अर्नेस्य’ने ३१.१.२००३ को नई दिल्लीमें हुए ‘अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थामें’ ‘शोध एवं शिक्षासे परे हमारे सामाजिक कर्तव्य’के विषयपर बोलते हुए कहा, ‘मुक्त अर्थव्यवस्थामें आज केवल मूल्य नहीं अपितु केवल लाभ ही महत्त्वपूर्ण होनेसे नैतिक प्रदूषण निर्माण हुआ है । नैतिक प्रदूषण इतना अधिक हो गया है कि, इस अधःपतनके कारण समाजकी प्रकृतिके विषयमें गैरजिम्मेदारी बढ गई है, उसी कारण जागतिक पर्यावरण संकटमें आ गया है ।
प्रकृतिपर मानव अत्याचार करेगा, तो प्रकृति भी उसका बदला लेगी !
‘प्रकृतिपर मानव अत्याचार करेगा, तो प्रकृति भी उसका बदला लेगी । उर्जा का अभाव, अनावृष्टि, अकाल, वांशिक संघर्ष, नैतिक अधःपतन, भीषण रोगों का प्रादुर्भाव तथा अंत में महायुद्ध ! वर्षा कैसे होगी ? मेघ अंतरिक्ष में जमा होकर बरसतें हैं वह केवल वृक्षों के लिए । डॉलर्सपर प्रेम करनेवाले निकृष्ट मनुष्य के लिए कैसे और क्यों मेघ बरसेंगे ?.. कर्मविपाक या कर्मनियम व्यष्टि, समष्टि तथा अखिल विश्व नियंत्रित करता है, यह नियम सर्वत्र अव्याहत एवं, निराबाध है !’
मनुष्य के बढते पापों के कारण ही प्रदूषण की समस्या बढ रही है !
यह सब आज आधुनिकता के प्रभाव से हो रहा है । आज प्रत्येक मनुष्य में विषय वासनाओं के अत्याधिक प्रभाव के कारण तथा सत्य के ज्ञान का अभाव होने से मानव जीवन में अनावश्यक विकृतियां जन्म ले रही हैं, उन्हें ही पाप कहते है। आज यह पाप इतना बढ गया है, कि इस विकृति के कारण स्वयं मानवने अपना शरीर दूषित कर लिया है । बाहर के वातावरण में मनुष्य के विचारों के कारण निर्माण हुए परिपाक से सर्वत्र की हवा तथा पानी दूषित हो गया है; इसीलिए आज प्रमुखता से प्रदूषण की समस्या सभी को डरा रही है । यह सब हमारी विकृति के कारणही हुआ है । मनुष्य को जीने के लिए शुद्ध हवा, शुद्ध पानी, सात्त्विक आहार, स्थलकाल तथा वातावरण के अनुसार वेशभूषा और घर की आवश्यकता है; परंतु उसे यह ध्यान में नहीं आता कि स्वयं के सुख की विकृत समझ के कारण ही हम अपना नाश कर रहे हैं । इसलिए अपना रहन-सहन निसर्ग नियम के अनुसार रखना चाहिए । हमने अपन ही अज्ञान के कारण स्वयं के लिए समस्याएं निर्माण कर ली हैं । आज प्रदूषण तथा ऊर्जा संकट के प्रश्न कितने भीषण हो गए है । अब हमें इन बातों की सांस्कृतिक जड (मूल) क्या है, यह ढूंढकर उसके अनुसार आचरण करना चाहिए ।
भारतीय दर्शन यह मानता है कि इस देह की रचना पर्यावरण के महत्त्वपूर्ण घटकों- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से ही हुई है। समुद्र मंथन से वृक्ष जाति के प्रतिनिधि के रूप में कल्पवृक्ष का निकलना, देवताओं द्वारा उसे अपने संरक्षण में लेना, इसी तरह कामधेनु और ऐरावत हाथी का संरक्षण इसके उदाहरण हैं। कृष्ण की गोवर्धन पर्वत की पूजा की शुरुआत का लौकिक पक्ष यही है कि जन सामान्य मिट्टी, पर्वत, वृक्ष एवं वनस्पति का आदर करना सीखें।
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