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                         दहेज: एक कुप्रथा दहेज़ एक सामाजिक अपराध हैं जब भी इस कारण किसी लड़की को जान गँवानी पड़ती हैं तो तरस आता हैं उस नौजवान पर कि अपने आपको मर्द कहने वाला असल में कायर हैं उसके कन्धों में इतना बल नहीं कि एक परिवार बना सके | जब दम नहीं तो स्वीकार करों यूँ औरत के जीवन का फैसला करने का कोई हक़ नहीं हैं | बेटी के माता पिता को उसे पढ़ाकर अपने पैरों पर खड़ा करने का काम करना चाहिए ना कि कुछ चंद रुपये देकर उसे किसी के हवाले क्यूंकि आपका यह सोचना कि इस सबके बाद आपकी बेटी खुश हैं या आपके कन्धों पर उसका कोई बोझ नहीं, तो आप गलत हैं | ना बेटी खुश हैं और उसके दुःख का भार, आप पर जिंदगीभर हैं | दहेज़ कुप्रथा तेरी ही बगिया में खिली  तितली बन आसमां में उड़ी हूँ  मेरी उड़ान को तू  शर्मिंदा ना कर  ए बाबूल मुझे दहेज़ देकर बिदा ना कर   अरमानो का मोल लगाना बंद करो  दहेज़ के लिए लड़का बेचना बंद करो   सरेआम नीलामी की मौहर लगती हैं लड़के के माथे पर  और सीना तान ...